बोलूँगा तो बोलोगे कि बोलता है !
नक्सली हमले में मारे गये कॉंग्रेसियों के लिये खूब आँसू बहाये गये , नक्सल विचारधारा को उतना ही गरियाया भी गया , नक्सलियों को नेस्तनाबूद करने के लिये नये नये उपाय बताये गये और तो और आदिवासियों के सबसे खूंखार दुश्मन महेन्द्र कर्मा को महामानव तक कहा गया !
जब भी मैं टी वी खोलता था तो आश्चर्य के साथ साथ हँसी भी आती थी कि कैसे कैसे उटपटांग तर्क दिये जाते थे , नक्सलियों के खिलाफ में और महेन्द्र कर्मा के पक्ष में !
नक्सलियों के इस कार्रवाई को हिंसा और प्रतिहिंसा के बीच गड्डमड्ड नहीं किया जा सकता , उनकी कार्रवाई का विरोध अपनी गंदी राजनीति को चमकाने के लिये भले किया जा सकता है !
जिस तरह बिहार में रणवीर सेना प्रमुख ब्रह्मेश्वर मुखिया था , उनसे भी खुखार महेन्द्र कर्मा का पूरा गिरोह था , जिसे खुले तौर पर सत्ता का संरक्षण प्राप्त था !
नक्सलियों ने सही किया या गलत इसे टी वी पर देख कर या किसी नेता के कहने के आधार पर तय ना करें , जमीनी हकीकत समझें , फिर कोई फैसला करें !
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