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October 27, 2012

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जातिगत आरक्षण -
                               बर्ण  व्यवस्था के अधर पर आरक्षण निति का निर्माण हुआ।जिसका मुख्य उदेश्य था पिछड़े लोगों के समाज के मुख्य धारा  में लाना। हमारे यहाँ पिछड़ापन  का आधार कभी भी वर्ण नहीं रहा है, जैसे की कुछ राजघराने अर्थात चन्द्रगुप्त , अशोक , पाल वंश, चालुक्य  इसमें से कोई भी शासक आज के कथित उच्य वर्ग के नहीं है।आप सबोने कहानिओं में सुना होगा। एक गरीब ब्राह्मण।आरक्षण तब भी माली हालत के आधार  पे मिलनी चाहिए थी और आज भी।सहायता को अधिकार के रूप में बदल देने पे उत्कर्ष हर समय कमजोर होगा।आरक्षण का इस्तेमाल आजतक में किसी भी परगति के लिए होने के बजाय वोट बैंक को बढाने ये बदलने में किया जाता है।निति के आधार  पर और बिरोध की संभावनाओ के आधार पर ये निति 10 साल के लिए लाई  गयी।पर 70 साल से जब ये निति सही नहीं साबित हो रही है फिर भी हमारे सलमान खुर्सिद  जैसे नेता आरक्षण की आबोहवा को गर्म रखे रहते हैं।
बेशर्मी 
कुछ एतिहासिक भवन जो हमारे स्मारक हैं,

राष्ट्रपति भवन -Raisina Hill  के नाम से जाना जाने बाला ये भवन 1929 में अंग्रेज यांत्रिक Lutyens के द्वारा बनबाया गया था।रायसीना और मल्चा  गाँव को नस्तोनाबुत करके अंग्रेजों ने इससे बनबाया था। भारत की स्वतंत्रता के 65 साल बाद जब हमारे राष्ट्रपति दुसरे के बनाए छत के निचे रहते हों तो गरीबों को छत कहा से देंगे।गाँधी जी नहीं रहे नहीं तो मै  पूछता की असहयोग आन्दोलन में अंग्रेजों के सामान का उपयोग न करने का मतलब कही ये तो नहीं था की ये सामान उसके जाने के बाद उपयोग होगा?

संसद भवन - इस भवन का निर्माण भी Lutyens के ही देख रेख में हुआ, और इसका उद्घाटन Lord Irwin ने 1927 में किया था।ये भवन तथाकथित कदाब्बरो  के अनुशार भारतीय लोकतंत्र का मंदिर है, सोचने की बात ये है की 1920-1930 अंग्रेजों को तो ये समझ में आ ही रहा होगा की उनका पैर उखरने  लगा है, जैसा की हमारी एतहासिक किताबें बताती है!!फिर वो ऐसे भवनों का निर्माण क्यूँ कराए जा रहे थे!!!

इंडिया गेट - 1931 में lutyens के ही दुआर बनाया गया था जो की एक सहीद स्थल है उन 90000 सहिदों का जो सिपाही थे अंग्रेजों के झंडे को बुलंद करने के लिए British Indian Army .  आज हमारा  स्वतंत्रता दिवस वही मनाया जाता है और उसी के निचे हमारे शहीदों का स्मारक है। शहीदों की बिधवा के नाम पे कड़ोरो के जमीं घोटाले करते हो शहीदों के नाम पर कुछ अलग से जमीं नहीं दे सकते।

                                                             70 साल में इन्होने ऐसी कोई भी रचना नहीं की जिसको ये सीना चौला करके दिखा सके।रचना की है तो अपने खानदानी नामांकरण की , नेहरु शौचालय , इंद्रा estadium , संजय चिरियांघर,....

October 26, 2012

इतिहास के कुछ तथ्य जिन पर हम बेसरमी से नाज करते हैं।

1947 - आजाद भारत- कुछ जानकारों का मानना  है की ये हमारी 200 साल की अथक लड़ाई का प्रयास था। पर इसे सही तौर पे अंग्रेजों की मज़बूरी के तौर पे देखा जाना चाहिए। दुसरे विश्वयुद्ध के बाद ऐसे भी अंग्रेजों की हालत कही उपनिबेस चलाने  की नहीं थी।एक लम्बी लड़ाई का मतलब यही होता है की दुश्मन या तो ताकतवर है या हम खुद कमजोर हैं। अपने अनुसार हम मतलब निकाल  सकते हैं इस आजादी की लड़ाई का। इसे बेहतरीन व्यवसायिक निति के तहद भारतियों के सामने पड़ोसा  गया।जितनी संघर्ष हमारे आलाओं  ने खुद में किया उससे कम ही संघर्ष अंग्रजों के साथ किया गया।ठीकेदारी प्रथा के तहद भारत का ठिका बिदेशी कंपनी के हाथ से छीन कर देशी कंपनी के हाथ में डाल  दी गयी।कानून बनाया गया,वो भी भारितियों के जीवनयापन को ध्यान में न रख कर। सारे एक्ट ,पुलिस पेंनेल , रेल अधिनियम अभी तक अंग्रेजों की ही कॉपी हैं।।विशेष बातें तर्क में निकले तो अच्छा है।नहीं तो प्रबुद्ध त्र्क्शस्त्रिओन को मेरी ये बातें नहीं पचेंगी।
1948- भारत पाकिस्तान समझौता-   मुहम्मद बिन तुगलक इतिहास में पागल बादशाह के नाम से जाना जाता है।कुछ बुधिजिबिओं ने मुस्लिम के लिए अलग देश और हिन्दुओं के लिए अलग देश के निर्माण का संकल्प लिया।निजी स्वार्थ और सत्ता की चाहत में ये इतने गिर चुके थे इन्हें लाखों लोगों के जान की परबाह  तक नहीं रही।इतिहास गवाह था की ऐसा हो ही नहीं सकता था, और तो और ये तुगलक के भी बाप निकले पुरबी और पश्चिमी पाकिस्तान के बिच ये रास्ता भी देने को तैयार थे।नतीजा आजतक हम अपने पड़ोस में एक भाई को दुमन बना बैठे।32 साल से दोनों सरकारे कश्मीर के मुद्दे पे बात केर रही है और इस मुद्दे पे इतना पैसा बहा चुकी है की उतने पैसे में राजश्थान को कश्मीर बना दिया जाए।जर्मनी का मिलन हम सब जानते हैं क्या एक भी कोशिस  है हमारे तरफ से ऐसे मिलन का .हमारा इतिहास या रिश्ता जर्मनी के आपसी मतभेद के मुकाबले बहुत कम है।।  जारी रहे।।।।।।
 ताशकंद समझौता -
                         इतिहास  में पहली बार किसी विजय देश ने समझौता के तहद जीती हुई तो छोरिए अपनी जमीन  किसी हारे  हुए देश को दे देता है और बॉर्डर मैदानी इलाका छोड़ कर ऐसे घाटी  के इलाके को बना दिया जाता है जो कभी भी सुरक्षा के नजर से सही नहीं हो सकता।समझौता के सबसे बड़े सबूत माननिये श्व शाश्त्री जी का रहस्मय ढंग से मौत हो जाता है। पाक अधिकृत कश्मीर की जमीं देने के बाद भी कश्मीर इनके लिए बिशेष मुदा है जो चुनाव के कुछ महीने पहले गर्म होता है कुछ महीने बाद ठंढा।  पहले कश्मीरी हिन्दुओं को तंग किया जाता है फिर बदले की आग बता वहां के मुस्लिमो को, आखिर कुछ तो हो रहा होगा कश्मीर में जुल्म जिसपे लोग आक्रोशित हैं। अमेरिका के पुन्जीदुत अर्थात मानवाधिकार आयोग के अनुशार वह के लोग की कोई भी जिन्दगी निजी नहीं है। आर्मी के दुआर उनके माँ बहनों की इज्जत लुटी जाती है।बिरोध में गोलियां दागी जाती हैं, और ऐसे मुद्दे के उठाने में कत्त्र्बदी लोगो ने तो महारत ले ली है।।