Search This Blog

May 29, 2013

ह्वाएँ कुछ बदली सी चल रही हैं, प्रचंड गर्मी है, फिर भी लोग परिवर्तन यात्रा वहाँ करने जा रहे हैं जहाँ ना उनका तथाकथित वोट बॅंक है ना ही वहाँ की आबोहवा परिवर्तन चाहती है, आज तक के इतिहास मे किसी हमले मे कोई नेता मारा गया हो ये असामान्य बात है, नेता और गुण्डों के साठगाँठ को ही तो व्यापक और संभली हुई राजनीति कहते हैं, बयंत सिंह मारे गये , और इंद्रा गाँधी मे सिखों ने नुकसान भुगता, आज कॉंग्रेस के कारण कोई और बलि बेदी को तैयार है, तुर्रा ये है की राजनीति मे शायद अब गुंडाओं की ज़रूरत महसूस नही हो रही है, बातचीत का एक और दौर चलेगा, ६० से ज़्यादा जवानो की सहादत के बाद ये नही हुआ था,कॉंग्रेस फिर कह रही है की ये रमण सरकार की ग़लती है, अगर ये सही है तो राजनीति मे अब खून ख़राबे के ६० की दसक की कहानीशायद फिर शुरू हो फिर भी ह्मे क्या मतलब हम तो आम आदमी हैं बस चाहत यही है की इस गॅंग वॉर मे कुछ राजनीति मे सुधता आ जाए.

No comments:

Post a Comment