कहाँ गया वो भाजी खाजा ,अंधेर नगरी,चौपट राजा,
राह खड़ा वो अथक पथिक यूँ खुले हाथ चिलाया था,
चॉक गए थे लोग जरा पर समझ नहीं कुछ आया था,
अपने बीबी बच्चो के संग वो मगन हो रहे जाते थे,
कुछ किस्से उनके सुनते थे ,मुस्का के कुछ समझाते थे,
अपनी मंजिल को पाने का बस लक्ष्य लिए वो जाते थे,
राहों में कितने ही पागल यूँ रोज खरे मिल जाते थे.
मै भी थोरा सा चौका था,कुछ परिबर्तन सा दिखता था,
पर वो नंगा क्या कर पाएगा,जो जनता जैसा दिखता था..
मानवता की ये बात है क्या?, राजा कभी दोषी होता है?
राजा तो राजा ही होगा ,बस प्रजा भले ही रोता है..
एक टेके में भाजी क्या भाजी की भाभी नहीं होगी
खाजे की बात ?वो पागल है ,अरे भले ही चौपट रजा है…
इसमें उसकी क्या गलती थी वो वोट मांगने आया था…
कुछ ने पूछा बदले में क्या ? खाजा क रेट बताया था…
कुछ दिन वो नहीं रुक सकता है? फिर से वो मांगने आयेंगे,
न मने अब उस रेट में ये वो तब खाजा लेकर आयेंगे..
इसी तरह यह राज्य सदा बरे नियम धरम से जाएगी..
खाजा की पीछे ये दुनिया ,बस दुनिया को खा जाएगी..
बात यही पर ख़त्म करो,ये लो घर मेरा आया है,मै खाजा नहीं खाता हूँ,
बीबी ने सब्जी मंगवाया है।
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