क्या ख़ता है मेरी , तू बोल दे खुदा !
अब तो हँशी तू दे दे, कब तक रहूँ जुदा!!
तू ही करेगा जानके, अब तक रहा जिया .
न फल ही कोई पाया ,न रश कोई पिया.
जख्म मिला खूब पर मरहम नहीं मिला,
मेरे भी खिलने का कोई मौषम नहीं मिला.
सब का हाले दिल जब तू जनता ही है,
तेरे नज़र में क्या मेरा दिल, दिल नहीं है..
इशी से शक हुआ, कही तुम झूठा तो नहीं,
या इस न समझ नादाँ से तुम रूठा तो नहीं..
तुझसे मिलेगी एकदिन ख़ुशी मुझे ,सोच समझ कर दिल जाता है गुद-गुदा !!
क्या ख़ता है मेरी .....................
मंजिलो को देख लेना बात है क्या?
पर कदम क्या साथ मेरे आज है क्या?
रोने से कभी है किशी का दुःख नहीं थम्हा...
बांध गयी ये जिन्दगी,और मुकदर है कहा?
मुक्कदर गर बुरा है तो मुक्कदर की ख़ता क्या है?
मुक्कदर कौन लिखता है ,मुक्कदर को पता क्या है?
मुक्कदर को लिखने बाला गर सरकार है खुदा...
तो तुझसे इस नाचीज की दरकार है खुदा..
दुनिया से मुझको ले लो..या मुझको दुनिया दे दो..
जीने की तो छोर , मई मरना भी नहीं चाह्त्ता ....
गुमनाम ....गुमशुदा...
क्या ख़ता है मेरी तू बोल दे खुदा..
अब तो हशी तू दे दे ..कब तक रहू जुद्दा...
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